174वें ऐतिहासिक रामलीला महोत्सव में हुआ नारद मोह लीला का भावपूर्ण मंचन
नारद के अभिमान, विष्णु की माया और श्राप की कथा ने मोहा दर्शकों का मन

कोंच। नगर में चल रहे 174वें ऐतिहासिक रामलीला महोत्सव के अंतर्गत सोमवार की रात रामलीला भवन में नारद मोह लीला का भावपूर्ण मंचन किया गया। कलाकारों ने अपने सशक्त अभिनय और संवाद अदायगी से विभिन्न पात्रों को जीवंत कर दिया, जिससे रामलीला भवन में मौजूद दर्शक देर रात तक लीला से जुड़े रहे।

लीला का शुभारंभ भगवान लंबोदर गणेश जी की आरती के साथ हुआ। मंचन में दिखाया गया कि देवर्षि नारद गंगा तट पर आसन लगाकर कठोर तपस्या में लीन हैं। नारद की तपस्या भंग करने के लिए इंद्रदेव कामदेव और अप्सरा को भेजते हैं, लेकिन कामदेव उनकी तपस्या भंग करने में सफल नहीं हो पाते। तपस्या भंग न होने पर नारद मुनि के मन में अभिमान उत्पन्न हो जाता है। उन्हें लगता है कि उन्होंने कामदेव पर विजय प्राप्त कर ली है और अब वह कामजीत नारद बन गए हैं। इसी अभिमान में वह पहले अपने पिता ब्रह्मा और फिर भगवान शंकर के पास पहुंचकर अपनी विजय का बखान करते हैं। इसके बाद नारद भगवान विष्णु के समक्ष भी अपने तप और विजय का प्रदर्शन करते हैं। नारद के इसी अभिमान को समाप्त करने के लिए भगवान विष्णु उन्हें मृत्युलोक की स्थिति देखने भेजते हैं और अपनी मोह-माया रचते हैं। इसी माया के प्रभाव में नारद मुनि राजा शीलनिधि की पुत्री शीलमणि के रूप-सौंदर्य से प्रभावित हो जाते हैं और उनसे विवाह करने के लिए आतुर हो उठते हैं।

भगवान विष्णु नारद के अभिमान को समाप्त करने के लिए अपनी माया से उनका मुख वानर जैसा कर देते हैं। स्वयंवर सभा में पहुंचने पर राजकुमारी शीलमणि नारद की उपेक्षा कर भगवान विष्णु का वरण कर लेती हैं। वहीं नारद के साथ चल रहे रुद्रगण उनके वानर रूप को देखकर उनका उपहास करते हैं। अपने अपमान से क्रोधित नारद मुनि भगवान विष्णु को श्राप देते हैं कि जिस प्रकार उन्हें पत्नी वियोग का कष्ट सहना पड़ रहा है, उसी प्रकार भगवान विष्णु को भी पत्नी वियोग का त्रास झेलना पड़ेगा और उन्हें वानरों की सहायता लेनी पड़ेगी। रामलीला के इस प्रसंग के माध्यम से यह संदेश भी सामने आया कि अहंकार मनुष्य के विवेक को प्रभावित कर देता है और उसका अंत अंततः विनाशकारी होता है। यही श्राप आगे चलकर भगवान विष्णु के श्रीराम अवतार और राम-रावण युद्ध की कथा का महत्वपूर्ण आधार बनता है।
कलाकारों ने निभाई विभिन्न पात्रों की भूमिका –
मंचन में तुलसीदास की भूमिका संतोष त्रिपाठी, नारद की भूमिका मृदुल शुक्ला, शंकर की भूमिका हरिश्चंद्र तिवारी, पार्वती की भूमिका सूरज शर्मा, इंद्र की भूमिका जवाहर अग्रवाल, विष्णु की भूमिका राघवेंद्र तिवारी, रुद्रगण की भूमिका राघवेंद्र तिवारी, चमेंड़ एवं आकाश शांडिल्य, कामदेव की भूमिका गौरीशंकर झा, अप्सरा की भूमिका प्रशांत चौहान, ब्रह्मा की भूमिका लकी दुवे, ऋषिगण की भूमिका विनीत मिश्रा एवं शिवकुमार गुप्ता, नंदी की भूमिका रुचिर रस्तोगी, राजा शीलनिधि की भूमिका छोटे सोनी तथा घनचक्कर की भूमिका पवन यादव ने निभाई।
रामलीला के सफल आयोजन में रामलीला समिति के अध्यक्ष राजीव पटेल, मंत्री शैलेष सोनी, अभिनय विभाग अध्यक्ष पीडी रिछारिया, मंत्री सुधीर सोनी, जय प्रकाश मुखिया, संजय सोनी, अतुल चतुर्वेदी, पवन अग्रवाल, अमित नगाइच सहित अन्य कार्यकर्ताओं का सहयोग रहा।



