पत्रकारिता का मूलमंत्र है कि “हर वो व्यक्ति जो समाज में छिपी बुराईयों को निःस्वार्थ रूप से सार्वजनिक करने की चाह रखता वह पत्रकार है।”
वर्तमान समय में पत्रकारिता का जुनून युवाओं के सर चढ़ कर बोल रहा है। बेरोजगारी के चक्कर में अपराध और समाजिक बुराईयो से दूर होकर युवा इस क्षेत्र को चुन रहे है। ऐसा नही है कि वो काम नही करते पिछले सात वर्ष को छोड़ दे तो ग्रामीण आँचल की प्रत्येक खबर के लिए संस्थान के संवादाता को घटना स्थल पर जाना पड़ता था। दिन- दिन भर घूमकर के समाचार बनाना पड़ता था चाहे संस्थान छोटा हो या बड़ा हो।
आज जब सोशल मीडिया का समय है। युवाओं में जागरूकता बढ़ी है। अब दशकों से छुपी रही बुराई को वह सार्वजनिक कर रहे है। मुख्यालय से लेकर कस्बे,गांव,बीहड़ तक मेहनत कर रहे है । अपने काम से समाज को कही न कही लाभ पहुंचा रहे है। लेकिन कुछ कथित लोग इनको फर्जी कहकर उनको नीचा दिखाने की फ़िराक़ में रहते है। असल में गलती उनकी नही है।जिसको भी पत्रकारिता के कलम से चोट पहुंचाते है वह चिल्लाता है। और उनको फर्जी कहकर अपना आक्रोश मिटाता है।
असल में पत्रकारिता का मूलमंत्र है कि “हर वो व्यक्ति जो छिपी समाजिक बुराईयों को निःस्वार्थ रूप से सार्वजनिक करने की चाह रखता हो वह पत्रकार है।”
फर्जी पत्रकार वो होता है जो उस संस्थान में काम न करता हो जिस संस्थान का नाम लेकर अपना परिचय देता हो। ऐसे पत्रकारों को उक्त संस्थान और सूचना विभाग चिन्हित करता है ना कि कथित लोग।
जिले का इतिहास बताता है कि 80 के दशक में फूलन देवी ने जगम्मनपुर के बाज़ार में 6 घण्टे तांडव किया।उस तांडव की खबर को मुख्यालय आते-आते 12 से 14 घण्टे लगे थे। जब तक सब कुछ लुट चुका था। ऐसा इसलिए हुआ था कि संसाधनो का आभाव था।
उसी के पटल आज जब सोशल मीडिया के पाठकों को बीहड़-आँचल की छोटी बड़ी सब खबर मात्र 10 से 15 मिनट में मिल जाती है। इतना ही नही इनकी खबरों को सरकारी तंत्र भी संज्ञान में लेता है और समय रहते कार्यवाही भी कर देता है ऐसा सम्भव उन होनहार युवाओं के कारण हो रहा है जो आज भी अपना फोन चार्ज करने अपने घर से 10 किलोमीटर दूर आते है। क्योंकि ग्रामीण आँचल में विद्युत व्यवस्था का क्या हाल है ये किसी से छुपा नही है। आज स्थानीय, प्रादेशिक मीडिया हो या राष्ट्रीय मीडिया सब के महत्वपूर्ण सूत्र यही लोग है। जो बिना पगार लिए समाचार संकलन का कार्य करके सब को परोस रहे है। इनकी मेहनत को नकारा नही जा सकता है।
किसी के कहने से कोई फर्जी नही होता। यदि फर्जी है तो सूचना विभाग क्या कर रहा है ? अभी तक कितने फर्जी पत्रकारों के नाम मुकद्दमे दर्ज करवाये गए है ? किसी पत्रकार को फर्जी कहना आसान है लेकिन उसको साबित करना टेढ़ी खीर है।
फर्जी है असली है इसका फैसला उक्त व्यक्ति का संस्थान करेगा या सूचना विभाग और किसी को अधिकार नही है कि फील्ड में समाचार संकलन करने वाले को फर्जी कहे।
जो लोग इनको फर्जी कहते है वो याद रखे कि यदि इन सोशल मीडिया के होनहार युवाओं ने मोबाइल पर उंगली चलाना बन्द कर दी तो 80 के दशक की तरह 12 से 24 घण्टे में मालूम पड़ेगा कि जिले में क्या हुआ है। इसलिए वर्तमान की व्यवस्था को स्वीकार लेना चाहिए क्यों कि अब यह रुकने वाला नही है। अतः ऐसे लोगो को सम्मान की दृष्टि से देखा जाना चाहिए न की हेय दृष्टि से !
सर आपका लेख पढ़कर मेरे भीतर नयी ऊर्जा का संचार हुआ है ,क्योंकि कुछ दिन पहले मेरे एक जानने वाले ने मुझसे कहा था कुछ नहीं कर पाए तो पत्रकार व एंकर बन गये। मेरा मनोबल टूट गया था।
धन्यवाद !
सर आपका लेख पढ़कर मेरे भीतर नयी ऊर्जा का संचार हुआ है ,क्योंकि कुछ दिन पहले मेरे एक जानने वाले ने मुझसे कहा था कुछ नहीं कर पाए तो पत्रकार व एंकर बन गये। मेरा मनोबल टूट गया था।
धन्यवाद !