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अखिल भारतीय साहित्य परिषद के तत्वावधान में लेखकों, कवियों एवं साहित्यकारों ने धूमधाम मनाई बसंत पंचमी

उरई। आधुनिकता के इस परिवेश में जहां पाश्चात संस्कृति के युवा पीढ़ी पर बढ़ते दुष्प्रभाव के चलते कौटंभिक परंपरा, सनातन संस्कृति और लोकाचार में ह्रास हो रहा है। वहीं समाज में स्वार्थ की वृद्धि से पारस्परिक सौहार्द में भी गिरावट आई है। ऐसे में समाज को आत्म चिंतन करते हुए जीवन मूल्यों, परंपराओं, लोक संस्कृति और लोकाचार को आत्मसात करना होगा। तभी हम आत्मबोध से विश्वबोध तक की सिद्ध कर पाएंगे। उक्त विचार अखिल भारतीय साहित्य परिषद उत्तर प्रदेश के प्रदेश महामंत्री डॉक्टर महेश पांडे “बजरंग “ने स्थानीय जिला इकाई द्वारा कालपी रोड स्थित विवेकानंद कॉलोनी में बसंत पंचमी पर आयोजित संगोष्ठी में व्यक्त किये। श्री पांडे यहां मुख्य अतिथ के रूप में अपना व्याख्यान दे रहे थे। उन्होंने पंडित सूर्यकांत निराला की कई काव्य पंक्तियों का वाचन करते हुए ज्ञान, विद्या, बुद्धिप्रदात्रि मां शारदा की स्तुति की एवं साहित्य सेवा में सतत संलग्न लेखको, रचनाकारों व कवियों, कवित्रियों को संस्कृतिक संचेतना पर आधारित लेखन हेतु प्रेरित किया ।

अखिल भारतीय साहित्य परिषद के जिला अध्यक्ष श्री प्रेम नारायण दीक्षित “प्रेम” ने समस्त अभ्यागतो का अभिनंदन करते हुए वेद मत्रों के साथ मां सरस्वती का स्तवन करते हुए दीप प्रज्वलित किया तथा काव्य पंक्तियों को पढ़ा। आज तरंगों में तरलन में है, जल का संस्करण है। यादों में अभिमंत्र तुम्हारा, मोहन वशीकरण है।

नव हस्ताक्षर मनीष दीक्षित ने इन पंक्तियों के साथ सरस्वती वंदना प्रस्तुत की। अंबर में बिहरे जय भारती, मंद पवन मेघो के संग संग। ज्योति ज्योति उतरे जय भारती, चंद किरण तारों के संग संग।

अंतर्राष्ट्रीय ख्यातिलब्धि कवित्री डॉक्टर माया सिंह “माया” ने वासंतिक रचना इस प्रकार प्रस्तुत कर प्राकृतिक के सौंदर्य को साहित्यिक स्वरूप प्रदान किया। फूल खिले गेंदा कचनार के, आए दिन महकती बाहर के।

इसी क्रम में रामचरित मानस मर्मज्ञ एवं साहित्य परिषद के जिला महामंत्री श्री राम शंकर गौर ने बसंत रितु आगमन का मनमोहक वर्णन इन शब्दों में किया। सखे देखो बसंत आ गया है शीत ऋतु का बस अंत आ गया है। योगाचार्य एवं पूर्व आर्मी धर्मगुरू श्री शत्रुघ्न सिह ने इन शब्दों के साथ मां शारदा को स्वरांजलि प्रस्तुत की। स्वलय की गति से विहीन हूं, ताल छंद से महादीन हूं। मेरी जड़ बुद्धि में माता, स्वर का कुछ आभाष दो।

साहित्य परिषद के जिला प्रभारी अश्वनी मिश्रा “आकाश” ने संगोष्ठी का कुशल संचालन करते हुए ऋतु वर्णन इस प्रकार प्रस्तुत किया। “देखो बसंत पंचमी आ गई है निराली, बगिया में कुक रही कोयलिया काली। कलियों ने भी अपना घूंघट जो उठाया, फूलों को चूम रही तितलियां मतवाली” इस अवसर पर समाजसेवी भीम सिंह यादव, गोपाल विश्नोई पत्रकार और शिक्षक पत्रकार ओमप्रकाश तिवारी ने भी अपने सारगर्भित विचारों से संगोष्ठी को ऊर्जा प्रदान की। अंत में जिला महामंत्री श्री राम शंकर गौर द्वारा अतिथियों का आभार व्यक्त किया गया।

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